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तीसरे समायोजन का सच: कागजी छात्र-शिक्षक अनुपात और सहमति के नाम पर ट्रैप— हिमांशु

लखनऊ। शिक्षक समायोजन की प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। शिक्षक नेता हिमांशु ने तीसरे समायोजन को पहले और दूसरे समायोजन की गलतियों का नतीजा बताते हुए इसे शिक्षकों के लिए “सहमति का ट्रैप” करार दिया है। उन्होंने कहा कि विभाग का पूरा जोर केवल कागज़ों में छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) ठीक दिखाने पर है, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

हिमांशु ने बताया कि छात्र-शिक्षक अनुपात को लखनऊ में बैठकर एनआईसी के कंप्यूटर सिस्टम से सही करना व्यावहारिक नहीं है। यह पूरी तरह जिला स्तरीय प्रक्रिया है और इसे जिले में ही बेहतर तरीके से सुधारा जा सकता था। पहले और दूसरे समायोजन में हुई त्रुटियों से सबक लेने के बजाय विभाग तीसरे समायोजन को सामने ले आया और यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। आने वाले समय में उच्च प्राथमिक स्तर के विषयों में भी गंभीर समस्याएं सामने आ सकती हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि पीटीआर को केवल कागज़ों में संतुलित दिखाने के लिए नियमों के विरुद्ध शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को भी गिनती में शामिल किया जा रहा है। पहले और दूसरे समायोजन को स्वैच्छिक बताया गया, लेकिन नियम 21 के आधार पर शिक्षकों से केवल सहमति पत्र भरवाकर विद्यालय का विकल्प तक नहीं पूछा गया और जबरन समायोजन कर दिया गया। इस प्रक्रिया का लाभ कथित तौर पर कुछ नेताओं ने उठाया, जबकि तीसरे समायोजन में आम शिक्षक सबसे अधिक परेशान हो रहा है।

हिमांशु ने शिक्षकों से अपील की कि वे जिला स्तर पर संगठित होकर विरोध दर्ज कराएं। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर कई अधिवक्ताओं से चर्चा की गई है, जिसमें यही निष्कर्ष निकला कि प्रभावित शिक्षक—चाहे कनिष्ठ हों या वरिष्ठ—जिला स्तर पर टीम बनाकर जिले की समायोजन सूची को चुनौती दें। उन्होंने यह भी बताया कि वे अपने साथियों दुर्गेश, आवेश और गणेश के साथ इस संबंध में न्यायालय में भी उपस्थित रहे और पुरानी याचिकाओं पर भी सक्रियता से काम शुरू कर दिया गया है।

अंत में हिमांशु ने शिक्षकों से संगठित रहने, सहयोगात्मक रवैया अपनाने और मजबूती से एकजुट होकर अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ने का आह्वान किया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे शिक्षकों के साथ हैं और किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।

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