लखनऊ। प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के टलने के संकेत मिल रहे हैं। इसकी मुख्य वजह अभी तक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन न होना है, जिसके कारण पंचायतों में आरक्षण की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है।
पंचायतीराज विभाग ने छह सदस्यीय आयोग के गठन का प्रस्ताव शासन को भेजा है, लेकिन अब तक इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। जब तक आयोग का गठन नहीं होता और उसकी रिपोर्ट नहीं आती, तब तक पंचायत चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ना मुश्किल मानी जा रही है।
जनगणना 2011 के अनुसार राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या क्रमशः 20.6982 प्रतिशत और 0.5677 प्रतिशत है। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में इन्हीं वर्गों के लिए इसी अनुपात में सीटें आरक्षित रखी जाती हैं।
हालांकि ओबीसी जातियों का प्रतिशत जनगणना में शामिल नहीं था। रैपिड सर्वे 2015 के अनुसार राज्य की ग्रामीण आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी 53.33 प्रतिशत बताई गई थी।
पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने दावा किया है कि प्रदेश में पंचायत चुनाव समय पर अप्रैल–मई में ही कराए जाएंगे। आयोग गठन में हो रही देरी के सवाल पर उन्होंने कहा कि इस विषय में शीघ्र ही मुख्यमंत्री से चर्चा की जाएगी। उनका कहना है कि आयोग गठित होने के बाद दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंप देगा।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश स्तर पर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में ओबीसी के लिए आरक्षण 27 प्रतिशत रखना अनिवार्य है। किसी भी ब्लॉक में ओबीसी की जनसंख्या 27 प्रतिशत से अधिक होने पर भी ग्राम प्रधान पद पर इससे अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
नगर निकाय चुनाव में ओबीसी आबादी के आंकड़ों को लेकर विवाद हुआ था, जिसके बाद सरकार ने नगर निकायों के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर रिपोर्ट तैयार करवाई थी।

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