शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 और 17 नवंबर 2025 के फैसलों के बाद केंद्र सरकार ने देशव्यापी स्तर पर कार्रवाई तेज कर दी है। शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश जारी कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से प्रभावित शिक्षकों से जुड़ा विस्तृत और सत्यापित डाटा उपलब्ध कराने को कहा है।
3 दिसंबर 2025 को जारी किए गए डी.ओ. पत्र में संयुक्त सचिव (संस्थागत एवं प्रशिक्षण) ने स्पष्ट किया है कि जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पाँच वर्ष से कम समय शेष है, उन्हें टीईटी पास किए बिना सेवा में बने रहने की अनुमति दी गई है, हालांकि पदोन्नति के लिए टीईटी अनिवार्य शर्त रहेगी। वहीं आरटीई अधिनियम से पहले नियुक्त ऐसे शिक्षक, जिनकी सेवानिवृत्ति में पाँच वर्ष से अधिक का समय बचा है, उन्हें दो वर्ष की निर्धारित अवधि के भीतर टीईटी उत्तीर्ण करना होगा।
ऐसा न करने पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति और केवल सेवा-समापन लाभ दिए जाने का प्रावधान लागू हो सकता है।
केंद्र सरकार के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद शिक्षकों, शिक्षक संगठनों और जनप्रतिनिधियों की ओर से बड़ी संख्या में ज्ञापन और अनुरोध प्राप्त हुए हैं। इनमें यह आशंका जताई गई है कि सेवा के अंतिम चरण में मौजूद शिक्षकों के लिए टीईटी जैसी प्रतियोगी परीक्षा पास करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण और मानसिक दबाव पैदा करने वाला हो सकता है। साथ ही, लंबे समय से सेवाएं दे रहे अनुभवी शिक्षकों के बाहर होने से राज्यों की शिक्षा व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना भी व्यक्त की गई है।
इन्हीं चिंताओं को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले से प्रभावित शिक्षकों की वास्तविक संख्या का आकलन करें, उपलब्ध कराए जाने वाले सभी आंकड़ों का विधिवत सत्यापन सुनिश्चित करें, अपने-अपने राज्यों पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करें तथा प्रभावित शिक्षकों को राहत देने से जुड़े संभावित कानूनी और नीतिगत विकल्पों पर स्पष्ट राय प्रस्तुत करें।
शिक्षा मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्यों के भर्ती नियम राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानकों के अनुरूप होने चाहिए। इस संदर्भ में केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) के संशोधित भर्ती नियमों का उल्लेख करते हुए राज्यों से अपेक्षा की गई है कि वे भी समयबद्ध ढंग से अपने नियमों में आवश्यक बदलाव करें।
केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि संबंधित समस्त जानकारी और टिप्पणियाँ अनिवार्य रूप से 16 जनवरी 2026 तक उपलब्ध कराई जाएँ।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहली बार केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन के साथ-साथ उनके व्यावहारिक प्रभावों और संभावित राहत उपायों पर भी संगठित तरीके से विचार शुरू किया है। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में सरकारें लाखों अनुभवी शिक्षकों के हितों को ध्यान में रखते हुए कोई संतुलित और व्यवहारिक समाधान निकाल पाती हैं या नहीं।

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