तिरुवनंतपुरम। केरल में लगभग 50,000 शिक्षकों की सेवाओं पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दायर कर उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें शिक्षकों की नियुक्ति और पदोन्नति के लिए केरल शिक्षक पात्रता परीक्षा (के-टीईटी) को अनिवार्य किया गया है।
राज्य सरकार का कहना है कि केरल की शिक्षा व्यवस्था की अपनी विशिष्टताएं हैं और यहां लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों को व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। यदि यह फैसला पूरी तरह लागू होता है, तो बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक प्रभावित होंगे, जो वर्षों से सेवा दे रहे हैं
याचिका में प्रमुख मांगें:
सरकार ने याचिका में मांग की है कि 31 मार्च 2012 से पहले सेवा में आए शिक्षकों को के-टीईटी की अनिवार्यता से छूट दी जाए और उन्हें सेवानिवृत्ति तक सेवा में बने रहने की अनुमति मिले। इसके साथ ही नेट, पीएचडी और एमफिल जैसी उच्च योग्यताएं रखने वाले शिक्षकों को भी के-टीईटी से स्थायी छूट देने का अनुरोध किया गया है।
सरकार का तर्क है कि के-टीईटी शुरू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों की पदोन्नति में यह परीक्षा बाधा नहीं बननी चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया है कि पात्रता परीक्षा के बिना शिक्षण को राज्य के संदर्भ में गलत ठहराना उचित नहीं है, खासकर तब जब केरल शिक्षा मानकों में शीर्ष स्थान रखता है।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि इसका असर राज्य के हजारों शिक्षकों के भविष्य पर पड़ेगा।

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